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BJP vs Congress Social Media War: AI रोस्ट वीडियो, मीम्स और ‘झूठ की गूंज’ जैसी वेबसाइट्स, जानिए कैसे चल रहा है डिजिटल युद्ध

भारतीय राजनीति में चुनावी मुकाबले अब सिर्फ मंचों, रैलियों और पोस्टरों तक सीमित नहीं रहे हैं। आज का असली सियासी युद्ध स्मार्टफोन की स्क्रीन, इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉट्स और एक्स की टाइमलाइन पर लड़ा जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस, दोनों ही प्रमुख दल अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने और एक-दूसरे को घेरने के लिए सोशल मीडिया पर पूरी ताकत झोंक चुके हैं।

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Image : BJP vs Congress Social Media War | Credit : Social Media

इस डिजिटल जंग में अब पारंपरिक भाषणों की जगह आधुनिक जनरेटिव एआई वीडियोज, वायरल मीम्स, बॉलीवुड गानों पर नेताओं के फनी रोस्ट और टारगेटेड ट्रोल वेबसाइट्स ने ले ली है। पार्टियां सिर्फ अपने काम का प्रचार नहीं कर रहीं, बल्कि विरोधी नेताओं की छवि को नुकसान पहुंचाने के लिए रोज नए-नए डिजिटल हथियार ईजाद कर रही हैं। आइए समझते हैं कि सोशल मीडिया पर 2026 का यह हाई-टेक सियासी खेल कैसे खेला जा रहा है और इसके पीछे क्या रणनीति है।

एआई रोस्ट वीडियो और मीम्स: राजनीति का नया हथियार

पिछले कुछ महीनों में सोशल मीडिया पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई से बने वीडियोज की बाढ़ आ गई है। दोनों पार्टियों के आईटी सेल और डिजिटल वॉरियर्स ने विरोधियों को घेरने के लिए एआई आधारित रोस्टिंग का सहारा लेना शुरू कर दिया है।

बीजेपी की तरफ से हाल ही में महंगाई और पुरानी आर्थिक नीतियों को लेकर एक हाई-टेक एआई वीडियो जारी किया गया, जिसमें राहुल गांधी और कांग्रेस के पूर्व दिग्गज नेताओं के एआई अवतारों को एक साथ दिखाकर उन पर तीखा रोस्ट किया गया। वीडियो में पुराने दौर की महंगाई और आज की योजनाओं की तुलना बड़े ही मजेदार और चुटीले अंदाज में की गई। इसी तरह कर्नाटक और अन्य राज्यों में जब भी कोई राजनीतिक खींचतान होती है, तो नेताओं के कैरिकेचर और एआई वॉयस क्लोनिंग वाले वीडियो कुछ ही मिनटों में सोशल मीडिया पर वायरल कर दिए जाते हैं।

दूसरी तरफ कांग्रेस भी इस मामले में पीछे नहीं है। यूथ कांग्रेस और पार्टी के राज्य स्तरीय सोशल मीडिया हैंडल्स ने भी सरकार की नीतियों, बेरोजगारी और पेपर लीक के मुद्दों पर कई एआई क्लिप्स तैयार किए हैं। हालांकि कुछ समय पहले बिहार कांग्रेस द्वारा पीएम मोदी से जुड़े एक एआई वीडियो को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया था, जिसके बाद पुलिस में एफआईआर तक दर्ज कराई गई थी। इससे साफ है कि एआई वीडियो अब केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सीधे राजनीतिक हमले का माध्यम बन चुके हैं।

‘झूठ की गूंज’ और ट्रोल वेबसाइट्स का डिजिटल खेल

सोशल मीडिया वॉर का सबसे नया और अनोखा पहलू है सर्च इंजन और वेबसाइट्स के जरिए विरोधी की छवि को टारगेट करना।

हाल ही में जब राहुल गांधी ने देश के छात्र बहुल शहरों में ‘छात्रों की गूंज’ अभियान चलाया, तो उसके तुरंत बाद इंटरनेट पर ‘झूठ की गूंज‘ नाम से एक पूरी वेबसाइट लाइव हो गई। इस वेबसाइट पर राहुल गांधी के 40 दावों के वीडियो लगाकर उन्हें गलत साबित करने की कोशिश की गई। इस वेबसाइट के पीछे कौन है यह जानकारी गुप्त रखी गई, लेकिन इसके कंटेंट को बड़े पैमाने पर सोशल मीडिया पर फैलाया गया।

इसी तरह इंटरनेट पर राहुल गांधी अचीवमेंट्स डॉट कॉम नाम से एक वेबसाइट काफी चर्चा में रही। इस वेबसाइट पर जब कोई यूजर क्लिक करता है, तो पूरी स्क्रीन एकदम खाली यानी ब्लैंक दिखाई देती है। इसके जरिए यह संदेश देने की कोशिश की गई कि राहुल गांधी की उपलब्धियां शून्य हैं। राजनीतिक रूप से यह सर्च इंजन ऑप्टिमाइजेशन और डिजिटल डोमेन का ऐसा इस्तेमाल है जिससे इंटरनेट पर सर्च करने वाले न्यूट्रल युवाओं के दिमाग में एक खास नैरेटिव सेट किया जा सके।

स्टेट यूनिट्स और रील्स का मुकाबला: प्रो-एडिट्स और ट्रेंडिंग ऑडियो

बीजेपी और कांग्रेस की राज्य इकाइयां अब पूरी तरह से मॉडर्न कंटेंट क्रिएटर्स की तरह काम कर रही हैं। दिल्ली, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और तेलंगाना जैसे राज्यों में दोनों दलों के सोशल मीडिया वारियर्स की अपनी अलग टीमें हैं।

ये टीमें किसी भी मुद्दे पर तुरंत बॉलीवुड फिल्मों के मशहूर डायलॉग्स, साउथ सिनेमा के एक्शन सीन्स और इंस्टाग्राम पर ट्रेंड कर रहे वायरल गानों का इस्तेमाल करके नेताओं के प्रो-एडिट्स बनाती हैं। जहाँ एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरों और भाषणों को स्लो-मोशन, सिनेमैटिक बैकग्राउंड म्यूजिक और हाई-क्वालिटी विजुअल्स के साथ पेश किया जाता है, वहीं राहुल गांधी की जनसभाओं, यात्राओं और छात्रों से बातचीत के अनकट वीडियोज को भावुक और कनेक्टिंग अंदाज में एडिट किया जाता है। इसका सीधा मकसद उन करोड़ों युवा वोटर्स को जोड़ना है जो टीवी न्यूज नहीं देखते बल्कि सिर्फ शॉर्ट-फॉर्म वीडियोज से अपनी राय बनाते हैं।

राहुल गांधी की यूथ पॉलिटिक्स बनाम बीजेपी की डिजिटल मशीनरी

इस पूरे डिजिटल टकराव में दोनों पार्टियों की स्ट्रैटेजी बिल्कुल अलग नजर आती है। राहुल गांधी का पूरा फोकस इस समय देश के युवाओं, प्रतियोगी छात्रों, नीट अभ्यर्थियों और रोजगार के मुद्दों पर है। वे कोटा, प्रयागराज और पुणे जैसे शहरों में जाकर बिना किसी भारी तामझाम के छात्रों के बीच बैठते हैं और उनके वीडियो सीधे यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर अपलोड किए जाते हैं। इस अप्रोच से कांग्रेस युवाओं के बीच एक ऑर्गेनिक और जमीनी जुड़ाव बनाने की कोशिश कर रही है।

वहीं दूसरी ओर बीजेपी की डिजिटल मशीनरी बेहद तेज और संगठित है। जैसे ही राहुल गांधी कोई बयान देते हैं, बीजेपी का रिसर्च और मीडिया सेल तुरंत पुराने आंकड़े, पुराने भाषणों के वीडियो और इंफोग्राफिक्स बनाकर सोशल मीडिया पर उतार देता है। बीजेपी का कंटेंट डिलीवरी नेटवर्क इतना मजबूत है कि उनका मैसेज कुछ ही मिनटों में लाखों व्हाट्सएप ग्रुप्स और सोशल हैंडल्स तक पहुंच जाता है।

How to Join BJP IT Cell: बीजेपी आईटी सेल से कैसे जुड़ें?

सोशल मीडिया की बढ़ती ताकत को देखते हुए बहुत से युवाओं के मन में यह सवाल उठता है कि बीजेपी के आईटी सेल और डिजिटल वॉलंटियर नेटवर्क का हिस्सा कैसे बना जा सकता है। बीजेपी ने अपने डिजिटल विंग से जुड़ने की प्रक्रिया को काफी पारदर्शी और आसान बनाया है:

  1. नमो ऐप के जरिए रजिस्ट्रेशन: सबसे आसान तरीका नमो ऐप डाउनलोड करना है। ऐप के भीतर ‘वॉलंटियर’ या ‘कमल मित्र’ सेक्शन में जाकर कोई भी व्यक्ति अपनी प्रोफाइल बना सकता है और पार्टी के डिजिटल अभियानों से जुड़ सकता है।
  2. बीजेपी की आधिकारिक वेबसाइट: पार्टी की मुख्य वेबसाइट पर ‘जॉइन बीजेपी‘ और ‘वॉलंटियर’ का विकल्प मिलता है, जहाँ अपनी रुचि, जैसे कंटेंट राइटिंग, वीडियो एडिटिंग, ग्राफिक डिजाइनिंग या सोशल मीडिया शेयरिंग चुनकर फॉर्म भरा जा सकता है।
  3. स्टेट और जिला आईटी सेल से संपर्क: अपने राज्य या जिले के बीजेपी कार्यालय में आईटी और सोशल मीडिया सेल के संयोजकों से मिलकर स्थानीय स्तर की डिजिटल टीम में शामिल हुआ जा सकता है।
  4. डिजिटल योद्धा कार्यक्रम: पार्टी समय-समय पर सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और युवाओं के लिए ‘डिजिटल योद्धा’ वर्कशॉप्स आयोजित करती है, जहाँ ट्रेनिंग देकर उन्हें पार्टी के आधिकारिक नैरेटिव को फैलाने की जिम्मेदारी दी जाती है।

डीपफेक और एआई का खतरा: क्या यह लोकतंत्र के लिए सही है?

सोशल मीडिया पर बढ़ती इस एआई और मीम वॉर ने कई गंभीर नैतिक और कानूनी सवाल भी खड़े कर दिए हैं। जब असली और नकली वीडियो के बीच का फर्क मिटने लगता है, तो आम जनता के लिए सच और झूठ की पहचान करना बेहद मुश्किल हो जाता है।

एआई वॉयस क्लोनिंग और डीपफेक के जरिए किसी भी नेता के मुंह से गलत बयान कहलवाना समाज में नफरत या गलतफहमी फैला सकता है। यही वजह है कि चुनाव आयोग और साइबर सुरक्षा एजेंसियां अब राजनीतिक एआई कंटेंट पर सख्त दिशा-निर्देश और वाटरमार्क लगाने की तैयारी कर रही हैं ताकि तकनीक का इस्तेमाल निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया को नुकसान न पहुंचा सके।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

सवाल 1: बीजेपी और कांग्रेस सोशल मीडिया पर मुख्य रूप से किन टूल्स का उपयोग कर रही हैं?

जवाब: दोनों दल जनरेटिव एआई वीडियोज, इंस्टाग्राम रील्स, मीम्स, शॉर्ट्स और टारगेटेड वेबसाइट्स का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रहे हैं।

सवाल 2: ‘झूठ की गूंज’ वेबसाइट किसलिए बनाई गई थी?

जवाब: यह वेबसाइट राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ अभियान में दिए गए भाषणों के 40 दावों को काउंटर और गलत साबित करने के लिए बनाई गई थी।

सवाल 3: How to Join BJP IT Cell की आधिकारिक प्रक्रिया क्या है?

जवाब: नमो ऐप के वॉलंटियर सेक्शन या बीजेपी की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर डिजिटल क्रिएटर और सोशल मीडिया वॉलंटियर के रूप में सीधे जुड़ा जा सकता है।

सवाल 4: राजनीतिक दलों द्वारा AI वीडियोज बनाने पर क्या कानूनी नियम हैं?

जवाब: भ्रामक डीपफेक और मानहानिकारक एआई वीडियोज बनाने पर आईटी एक्ट की धारा 66डी और भारतीय न्याय संहिता के तहत कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

सवाल 5: सोशल मीडिया वॉर में सबसे ज्यादा किस वर्ग को टारगेट किया जा रहा है?

जवाब: 18 से 35 वर्ष के युवा मतदाताओं और पहली बार वोट देने वाले जेन-जी वर्ग को शॉर्ट वीडियोज और मीम्स के जरिए टारगेट किया जा रहा है।

निष्कर्ष: 2026 की भारतीय राजनीति में सोशल मीडिया केवल प्रचार का एक साधन नहीं रहा, बल्कि यह चुनाव की दिशा तय करने वाला मुख्य कुरुक्षेत्र बन चुका है। एआई रोस्ट वीडियोज, मीम्स और डिजिटल अभियानों ने राजनीति को पहले से ज्यादा तेज और आक्रामक बना दिया है। ऐसे दौर में आम नागरिकों और सोशल मीडिया यूजर्स के लिए यह जरूरी है कि वे किसी भी वायरल वीडियो या रोस्ट को देखकर तुरंत सच न मान लें, बल्कि हर राजनीतिक दावे की तथ्यात्मक जांच जरूर करें।

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